बुधवार, 26 मई 2010

यूं ही

उसके कदमों की आहट

सुनाई नहीं देती

खटकाता है वह कुंडी इस तरह

मानो डरता हो

कहीं जाग न जाए दीवार पर सोई छिपकली

इस तरह आता है वह

और घुल जाता है इस तरह

जैसे कभी गया ही न था

अपनी खिलखिलाती हंसी से

भर देना चाहता हो जैसे

उन तमाम कोनों को

उदासी जहां बाल बिखेरे बैठी है

कुछ देर के लिए ही सही

समेट लेती है वह जुड़े में अपने बाल

घूमने लगती है यूं ही

इधर-उधर

बनाती है चाय

बिखरे घर को समेटते

व्यस्त होने का दिखावा करती

हंसती है फीकी हंसी

जिसके किनारों पर

उदासी पांव जमाए बैठी है

वह बना रहता है अनजान

फिल्मों की बातें करता है

पूछता है बच्चों के हाल-चाल

अचानक घड़ी को देखते हुए

कुछ इस तरह चल देता है

जैसे याद आया हो अभी-अभी

छूट रहा कोई बेहद जरूरी काम

बहुत जल्दबाजी में विदा ले

निकल आता है वह सड़क पर

जहां घंटों भटकता है यूं ही

24 सितम्बर 2008

रविवार, 11 अप्रैल 2010

पगली सी

बंद आँखों में सपने थे
चौड़े कन्धों पर डाल
अपनी देह का भार
सपनीली उड़ान में उसने पंख नहीं खोले थे

हवा से भी हल्की
खुशबू से भी भीनी
शहद से भी मधुर
प्रेम सी झीनी
जाने कैसी थी वह

सपनों में डूबी
पगली सी

छू भर लेने से पिघल जाती
फूँक भर से उड़ जाती
बिखर जाती नज़र भर में ...

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

खेल का मैदान

मेरे घर के सामने था एक मैदान
बारिशों के बाद इसमे उग आती थी
लम्बी लम्बी घास
उन दिनों बच्चों की गेंद
अक्सर गुम हो जाती थी वहां
जब घास कटती
बच्चे तलाश में निकल जाते
अपनी खोई गेंद की

कभी कभार
मैदान के आस-पास निकल आते थे सांप
चूहों के बिलों से आबाद रहता था मैदान
माएं डरती थीं बच्चों को मैदान में भेजने से
लेकिन बच्चे थे की मौका मिलते ही आ जुटते थे यहीं

बच्चों के खेल से आबाद रहता था मैदान

यह जो खड़ी है बहु मंजिला इमारत
जिसके पीछे हमारे घर छुपे
सहमे से खड़े हैं
ठीक यहीं
इसी इमारत के नीचे था
वह मैदान
जो हमारे बच्चों की याद में
अब भी है उतना ही जीवंत

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

सृष्टि का भार

उसके माथे पर रखा है समूची सृष्टि का भार
कंधों पर उसके धरे हैं पहाड़
पीठ पर उठाये खड़ी है वह
चीड और देवदार
उसकी आंखों से छलकता है
समंदर

उसके हिस्से में टुकड़े-टुकड़े आता है आसमान
पहुंचता नहीं है उस तक बारिश का पानी
बस भीगते रहते हैं पहाड़,
चीड़ और देवदार

वह देखती है बारिश
अपनी सपनीली आंखों से
बढाती है हाथ
और डगमगाने लगता है
सृष्टि का भार
झुकने लगते हैं पहाड़

उसके कदमों को छु कर गुज़रती है नदी
उसके थके पाँव
डूब जाना चाहते हैं
उसके ठंडे मीठे पानी में
बारिश में देर तक भीगना चाहती है वह

कोई आओ
थाम लो कुछ देर सृष्टि
उठा लो कुछ देर पहाड़, चीड़ और देवदार
या भर लो उसे ही अपने भीगे दमन में इस तरह
की वह खड़ी रह सके
थामे हुए अपने माथे पर
अपनी ही रची सृष्टि का भार

बात

बात जब करते हैं हम
मैं कुछ कहती हूँ
तुम कुछ सुनते हो

तुम कुछ कहते हो
मुझे सुने देता है
कुछ और ही

हम हो जाते हैं मौन
तुम कहते हो कुछ
मैं कहती हूँ कुछ
न तुम कुछ सुनते हो
न मैं सुनती हूँ कुछ

यूँ हम करते हैं बात इसके बाद भी

सोमवार, 2 नवंबर 2009

जुगनू

रात के अंधेरों में
हम जुगनू पकड़ते थे
बंद मुठ्ठी में जुगनू के साथ
हाथ में आ जाता था रात का अँधेरा भी
जुगनू मर्तबान में बंद
लड़ते रहते अंधेरे से
सुबह तक दम तोड़ देते थे

अँधेरा जमा होता गया
कांच की दीवारों पर

यहाँ से देखो

यहाँ से देखो
आसमान कितना नीला है
घास कितनी हरी
कितना चटख है फूलों का रंग
कितना साफ़ दिख रहा है
तालाब का पानी
हवा में घुल रही है
कैसी भीनी गंध
नहीं, बंद मत करो
खिरकी के पल्ले
यूँ ही रहने दो उन्हें
आधा खुला
झूलता हवा में