मंगलवार, 17 जनवरी 2012

इस तरह मत टूटना

मुरझाना तो इस तरह जैसे
मुरझाते हैं अनार के फूल
एक नए फल को जन्म देते हुए
जो भरा हो असंख्य सुर्ख लाल रसीले दानों से

झरो तो इस तरह जैसे
झरते हैं हारसिंगार के फूल मुंह अन्धेरे
धरती पर बिछा देते हैं चादर
जिन्हें चुन लेती हूँ मैं
सुबह सुबह

टूटना तो इस तरह जैसे
टूटता है बीज
जब जन्म लेता हैं नया अंकुर
जीवन की सम्भावना लिए अपार

गिरना किसी झरने की तरह
सर सब्ज कर देना धरती

सूखे पत्ते की तरह मत झरना
इस तरह मत टूटना
जैसे टूटता है हृदय प्रेम में

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

धावक

नींद से जागती हूँ
जैसे गोली छूटती है बन्दूक से

सोती हूँ जैसे धावक बैठा हो तैयार
दौड के लिए

शुरू होता है दिन
एक ऐसी दौड की तरह
जिसमे जीत का लक्ष्य नहीं

एक ऐसी मैराथन जिसके लिए
नहीं है सामने कोई धावक
थामने को मशाल
किसी भी निश्चित दूरी के बाद

अपनी मशाल को
अपने हाथों मे थामे मजबूती के साथ्
खत्म होती है दौड
हर रात
ढ़ती हूँ फिर नींद के आगोश में

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

रिक्त स्थानों की पूर्ति करो

बचपन से सिखाया गया हमें

रिक्त स्थानों की पूर्ति करना

भाषा में या गणित में

विज्ञान और समाज विज्ञान में

हर विषय में सिखाया गया

रिक्त स्थानों की पूर्ति करना

हर सबक के अन्त में सिखाया गया यह

यहाँ तक कि बाद के सालों में इतिहास और अर्थशास्त्र के पाठ भी

अछूते नहीं रहे इस अभ्यास से


घर में भी सिखाया गया बार बार यही सबक

भाई जब न जाए लेने सौदा तो

रिक्त स्थान की पूर्ति करो

बाजार जाओ

सौदा लाओ


काम वाली बाई न आए

तो झाड़ू लगा कर करो रिक्त स्थान की पूर्ति


माँ को यदि जाना पड़े बाहर गांव

तो सम्भालो घर

खाना बनाओ

कोशिश करो कि कर सको माँ के रिक्त स्थान की पूर्ति

यथासम्भव

हालांकि भरा नहीं जा सकता माँ का खाली स्थान

किसी भी कारोबार से

कितनी ही लगन और मेहनत के बाद भी

कोई सा भी रिक्त स्थान कहाँ भरा जा सकता है

किसी अन्य के द्वारा

और स्वयम आप

जो हमेशा करते रहते हों

रिक्त स्थानों की पूर्ति

आपका अपना क्या बन पाता है

कहीं भी

कोई स्थान


नौकरी के लिए निकलो

तो करनी होती है आपको

किसी अन्य के रिक्त स्थान की पूर्ति


यह दुनिया एक बडा सा रिक्त स्थान है

जिसमें आप करते हैं मनुष्य होने के रिक्त स्थान की पूर्ति

और हर बार कुछ कमतर ही पाते हैं आप स्वयं को

एक मनुष्य के रूप में

किसी भी रिक्त स्थान के लिए

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

मरुस्थल की बेटी

क्या तुम्हे याद हैं
बीकानेर की काली पीली आन्धियाँ

उजले सुनहले दिन पर
छाने लगती थी पीली गर्द
देखते ही देखते स्याह हो जाता था
आसमान

लोग घबराकर बन्द कर लेते थे
दरवाज़े खिड़कियाँ
भाग भाग कर सम्हालते थे
अहाते मे छूटा सामान

इतनी दौड भाग के बाद भी
कुछ तो छूट ही जाता था जिसे
अन्धड़ के बीत जाने के बाद
अक्सर खोजते रहते थे हम
कई दिनों तक
कई बार इस तरह खोया सामान
मिलता था पडौसी के अहाते मे
कभी सडक के उस पार फँसा मिलता था
किसी झाडी में
और कुछ बहुत प्यारी चीजें
खो जाती थीं
हमेशा के लिए

मुझे उन आन्धियों से डर नहीं लगता था
उन झुल्सा देने वाले दिनों में
आँधी के साथ् आने वाले
हवा के ठंडे झोंके बहुत सुहाते थे
मैं अक्सर चुपके से खुला छोड देती थी
खिड़की के पल्ले को
और उससे मुंह लगा कर बैठी रहती थी आँधी के बीत जाने तक
अक्सर घर के उस हिस्से मे
सबसे मोटी जमी होती थी धूल की परत
मैं बुहारती उसे
अक्सर सहती थी माँ की नाराज़गी
लेकिन मुझे ऐसा ही करना अच्छा लगता था

बीते इन् बरसों में
कितने ही ऐसे झंझावात गुज़रे
मैं बैठी रही इसी तरह
खिड़की के पल्लों को खुला छोड
ठण्डी हवा के मोह मे बंधी

अब जब की बीत गई है आँधी
बुहार रही हूँ घर को
समेट रही हूँ बिखरा सामान
खोज रही हूँ
खो गई कुछ बेहद प्यारी चीजों को
यदी तुम्हे भी मिले कोई मेरा प्यारा सामान
तो बताना ज़रूर

मैं मरुस्थल की बेटी हूँ
मुझे आन्धियों से प्यार है
मै अगली बार भी बैठी रहूँगी इसी तरह
ठण्डी हवा की आस में

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

मन करता है

मन करता है
धरतीनुमा इस गेंद को
लात मारकर लुढ़का दूं

मुट्ठी में कर लूं बन्द
सुदूर तक फैले इस आसमान को
या इसके कोनों को समेटूं चादर की तरह
और गांठ मार कर रख दूं
घर के किसी कोने में

नदियों में कितना पानी
यूं ही व्यर्थ बहता है
इसे भर लूं मटकी में
और पी जाऊँ सारा का सारा

इन परिन्दों के पंख
क्यूं न लगा दूं
बच्चों की पीठ पर
और कहूँ उनसे
उड़ो
भर लो उन्मुक्त उड़ान
चीर दो इस नभ को
इस कायनात में कोई भी सुख ऐसा न रहे
जिसे तुम पा न सको
कोई भी दुख ऐसा न हो
जिसकी परछायी छू भी सके तुमको

बहुत अदना सी है
मेरी पहचान
बहुत सीमित है सामर्थ्य
एक माँ के रूप में
लेकिन कोई भी ताकत इतनी बड़ी नहीं
जो रोक सके उन्हें
इस जीवन को जीने से
भरपूर
मेरे रह्ते

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

इस बार का अकाल

कैसी गुनगुनी थी जाड़े की वो सुबहें
जो हमने विश्वविद्यालय से अल्बर्ट हाल तक के रास्तों को
कदमों से नापते हुए गुजार दीं

जून की तपती दोपहरों मे बैठे हुए कनक घाटी मे
किसी छतरी के नीचे
या किसी झाडी की ओट मे
धूप कभी तीखी नहीं लगती थी

किस तरह उमड आता था हिलोरे मारता प्यार
कि हम खुद ही लजा जाते थे एक दूसरे के आगे
न अपना होश था
न जमाने की परवाह

कितने खाली हाथ थे हम
कितने निहत्थे
कोई दावा नही
कोई अधिकार नही
न कोई अपेक्षा
न उम्मीद
बस इतना ही चाहा था
बस इतना ही सहा नही गया
बस इतना ही सम्भाला नही गया

अब यहाँ खिली जाड़े की धूप झुल्सा रही है मन को
और मन के भीतर उठ रहे हैं अन्धड़
जैसे कि पसरा हो वहाँ
जून का मरुस्थल
इस बार यह अकाल कुछ ज्यादा ही जानलेवा गुज़रेगा
मन के कोठार मे
एक दाना भी तो नही बचा है किसी कोने मे
क्या बुहारूं
क्या समेटूं
खाली घडों के पेंदे तक मे नही बची है पानी की कोई बूँद

सोमवार, 12 सितंबर 2011

मेरे घर की औरतें

आज बहुत याद आ रही हैं वे
मेरे घर कि औरतें

बहन

एक बहन थी छोटी
उस वक्त की नीली आँखें याद आती हैं
ब्याह दी गई जल्दी ही
गौना नहीं हुआ था अभी
पति मर गया उसका

इक्कीसवीं सदी में
तेजी से विकासशील और परिवर्तनशील इस समाज में
ब्राह्मण की बेटी का नहीं होता दूसरा ब्याह
पिता, भाई, परिवार के रहम पर जीना था उसे

नियति के इस खेल को
बीते बारह सालों से झेल रही थी वह
अब मर गई

फाँसी पर झूलने के ठीक पहले
कौनसा विचार आया होगा उसके मन में आखिरी बार

क्या जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं रहा था
जिसके मोह ने उसे रोक लिया होता

मात्र तीस साल की उम्र में
क्या ऐसा कोई भी सुख नहीं था
जिसे याद कर उसे
जीने की इच्छा हुई होती
फिर एक बार

मासी

बडी मासी से सबको डर लगता था
कोई भरोसा नही था उनके मिजाज़ का
घर की छोटी मोटी बातों में
सबसे अलग रखती थी राय

मासी अब नहीं रही
मासी की मौत जल कर हुई थी
कहते हैं उस वक्त घर में सब लोग छत पर सो रहे थे
सुबह चार बजे अकेले रसोई में क्या करने गई थी मासी
अगर पानी पीने के लिए उठी थी
तो चूल्हा जलाने की क्या ज़रूरत आ पड़ी थी
क्या सच में मौसा तुम्हें छत पर न पाकर रसोई में आए थे
क्या सच में उनके हाथ आग बुझाने की कोशिश में जले थे...

आज बहुत बरस गुज़र गए
तुम्हारी मौत को भी कई ज़माने हुए

अपनी साफगोई
अपने प्रतिवादों की
कीमत चुकाई तुमने
दुनिया के आगे रोए नहीं तुमने अपने दुख
पति की शराबखोरी और बेवफायी से लड़ती थी अपने अन्दर
और बाहर सबको लगता था
तुम उनसे झगड़ रही हो

तुमने जब देखा किसी स्त्री को उम्मीद से
हमेशा उसे पुत्रवती होने का दिया आशिर्वाद
तुम कहती थी
लड़कियाँ क्या इसलिए पैदा हों
ताकि उन्हें पैदा होने के दुख
उठाने पडें
इस तरह

बुआ

सोलहवाँ साल
जब आईने को निहारते जाने को मन करता है
जब आँचल को सितारों से सजाने का मन करता है
जब पंख लग जाते हैं सपनो को
जो खुद पर इतराने
सजने, सँवरने के दिन होते हैं
उन दिनों में सिंगार उतर गया था
बुआ का

गोद में नवजात बेटी को लेकर
धूसर हरे ओढ़ने में घर लौट आई थी
फूफा की मौत के कारण जानना बेमानी हैं
बुआ बाल विधवा हुई थी
यही सच था

वैधव्य का अकेलापन स्त्रियों को ही भोगना होता है
विधुर ताऊजी के लिए जल्दी ही मिल गई थी
नई नवेली दुल्हन
बूढे पति को अपने कमसिन इशारों से साध लिया था उसने
इसलिए सारे घर की आँख की किरकिरी कहलाई
लेकिन लड़कियों से भरे गरीब घर में पैदा हुई
नई ताई ने शायद जल्दी ही सीख लिया था
जीवन में मिलने वाले दुखों को
कैसे नचाना है अपने इशारों पर
और कब खुद नाचना है

नानी
अपने से दोगुनी उम्र के नाना को ब्याह कर लाई गई थी नानी
ससुराल में उनसे बड़ी थी
उनकी बेटियों की उम्र
जब हमउम्र बेटे नानी को
माँ कह कर पुकारते थे
तो क्या कलेजे में
हाहाकार नहीं उठता होगा

कहते हैं हाथ छूट जाता था नाना का
बडे गुस्सैल थे नाना
समाज में बड़ा दबदबा था
जवानी में विधवा हो गई नानी
सारी उम्र ढोती रही नाना के दबदबे को
अपने कंधों पर

गालियों और गुस्से को हथियार की तरह पहन लिया था उसने
मानो धूसर भूरी ओढ़नी
शृंगार विहीनता और अभाव
कम पडते हों
अकेली स्त्री के यौवन को दुनिया की नज़रों से बचाने
और आत्मसम्मान के साथ जीने को

जवानी में बूढ़े पति
और बुढ़ापे में जवान बेटों के आगे लाचार रही तुम
छत से पैर फिसला तुम्हारा
फिर भी जीवन से मोह नहीं छूटा
हस्पताल में रही कोमा में पूरे एक महिने तक
आखिर पोते के जन्म की खबर के साथ
मिला तुम्हारी मृत्यु का समाचार

मामी
कोई भी तो चेहरा नहीं याद आता ऐसा
जिस पर दुख की काली परछाइयाँ न हों
युवा मामी का झुर्रियों से भरा चेहरा देखती हूँ
तो याद आते हैं वे दिन
जब इसके रूप पर मोहित मामा
नहीं गया परदेस पैसा कमाने
बेरोजगारी के दिनो में पैदा किए उन्होंने
सात बच्चे

चाची
चाची रेडियो नही सुनती है अब
नाचना तो जैसे जानती ही नहीं थी कभी

पडौस के गाँव से
बडे उल्लास के साथ लाई थी दादी
सबसे छोटे लाड़ले बेटे के लिए
होनहार बहू
गाँव भर में चर्चा में होते थे
स्कूल में गाए उसके गाने और उसके नाच
चाची
जो सब पर यकीन कर लेती थी
अब सब तरफ लोग कातिल नज़र आते हैं
या दिखाई देते हैं उसे
सजिशों मे संलग्न

कहा था बडे बाबा ने एक दिन
इस घर की औरतों के नसीब में नहीं है सुख
आज याद आ रही हैं वे सब
जिन्होंने अपने परिवार के पुरुषों
के सुखों के लिए लगाया अपना जीवन
और ढोती रही दुख
अपने अपने नसीब के