शनिवार, 8 जून 2013

सूखे गुलमोहर के तले

चौके पर चढ कर चाय पकाती लडकी ने देखा 
उसकी गुडिया का रिबन चाय की भाप में पिघल रहा है
बरतनों को मांजते हुए देखा उसने 
उसकी किताब में लिखी इबारतें घिसती जा रही हैं 
चौक बुहारते हुए अक्‍सर उसके पांवों में 
चुभ जाया करती हैं सपनों की किरचें 

किरचों के चुभने से बहते लहू पर 
गुडिया का रिबन बांध लेती है वह अक्‍सर 
इबारतों को आंगन पर उकेरती और 
पोंछ देती है खुद ही रोज उन्‍हें 
सपनों को कभी जूडे में लपेटना 
और कभी साडी के पल्‍लू में बांध लेना 
साध लिया है उसने 

साइकिल के पैडल मारते हुए 
रोज नाप लेती है इरादों का कोई एक फासला 
बिस्‍तर लगाते हुए लेती है थाह अक्‍सर 
चादर की लंबाई की 
देखती है अपने पैरों का पसार और 
वह समेट कर रखती जाती है चादर को 

सपनों का राजकुमार नहीं है वह जो 
उसके घर के बाहर साइकिल पर चक्‍कर लगाता है 
उसके स्‍वप्‍न में घर के चारों तरफ दरवाजे हैं 
जिनमें धूप की आवाजाही है 
अमलतास के बिछौने पर गुलमोहर झरते हैं वहां 
जागती है वह जून के निर्जन में 
सूखे गुलमोहर के तले 

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

एक अशालीन ज़िद


1. 
ऐसा थोड़े ही है 
कि मुझे मालूम न हो 
कौनसी बातें नहीं कहती शालीन स्त्रियाँ 
यदि मैं भी न कहूं वह सब 
जो वे नहीं कह पातीं 
अपनी हज़ार विवशताओं के आगे 
तो कौन कहेगा आखिर 


2. 
मैं शिकायत करती हूँ 
क्योंकि मैं न्याय की उम्मीद करती हूँ 

क्योंकि ऐसा मानती हूँ मैं कि 
व्यवस्था के इरादे नेक हैं 
और आपकी अक्ल पर 
मट्टी नहीं पडी है अब तक 

आपके सोचने, समझने, 
देख पाने की सामर्थ्य पर 
मेरा संदेह 
एक यकीनन नाउम्मीदी में 
बदला नहीं है अब तक 
खैर मानिए 

3. 
अंगारों से दहकते हैं मेरे शब्द 

जेठ की चिलमिलाती धुप में 
रेत पर नंगे पाँव चलना है 
मेरी कविताओं से गुज़रना 

बबूल के लम्बे सफेद कांटे सी 
धंस जाती है ह्रदय के आर पार 

आग नहीं उगल रही हूँ मैं 
यह अनुभव हैं जीवन के 
जिन्हें मेरी प्रजाति ने जिया है 
मैं तो बस 
उन्हें साझा करने का बायस भर हूँ 

बुधवार, 28 नवंबर 2012

जन्म की कथा

माँ बताती थी 
आसमान से घर की बाखर में गिरी थी मैं 
ऐन माँ की आँखों के सामने 
और उन्होंने गोद में उठा लिया था मुझे 

जन्म की कथा तो माँ ही जानती हैं 
कितने ही आसमानों से गिरी हूँ जाने कितनी बार 
माँ ने हर बार भर लिया बाँहों में 
दिया दुलार 
मेरे लिए यह दुनिया 
घर की बाखर है 
जिसमे लगाती हूँ दौड़ निःसंकोच 
खेलती हूँ, हंसती हूँ गाती हूँ 
आसमान को छूने की जिद ठाने हूँ 
पिता सीढी ले आते हैं 
माँ साया बन साथ रहती है 

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2012

फितरत

सड़क पर चले जा रहे हों आप 
और उड़ता हुआ कबूतर कर दे 
पीठ पर बींट तो क्या करेंगे आप 
यही न की कोई कपड़ा या कागज़ खोज
पोंछ लेंगे उसे 
और चल देंगे अपनी राह 

घर के बाहर खड़ी गाय 
जिसे अभी खाने को रोटी दी आपने 
वह कर जाये घर के आगे गोबर 
या खा जाये वह पौधा 
जिसे आपने बहुत प्यार से लगाया था 
और जिसमे अभी फूल खिलने ही को था 
तब क्या करेंगे सिवाय इसके 
की गोबर को दरवाज़े के आगे से हटायेंगे 
और पौधे की थोड़ी पुख्ता 
करेंगे सुरक्षा 

गली का कुत्ता 
जिसे आप रोज़ दुलारते हैं 
कर ही जाता है कई बार 
बच्चों की गेंद पर पेशाब 
तब कुत्ते को समझाने तो नहीं जाते आप 
समझाते बच्चों को ही हैं 
और गेंद को कर लेते हैं पानी से साफ़ 

आपकी अपनी फितरत है 
और दुनिया की अपनी 
इसमें कैसी शिकायतें 
जिसे जो आता है 
मनुष्य भी वही करता है 

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

तुम नहीं हो

अच्छा ही है कि तुम नहीं हो 
तुम्हारी याद तुम्हारे होने से कहीं ज्यादा गहरी है 

तुम साथ् होते तो 
चीजें  अच्छी  ही होतीं 
लेकिन 
गर तुम नहीं हो साथ् 
तब भी बेहतर ही होंगी बातें 
कि दोगुनी ताकत 
और कई गुणा हिम्मत, मेहनत 
और प्यार के साथ् 
बनाउंगी मैं उन्हें ऐसा 
कि जान सको तुम 
ठुकराया जिसे तुमने 
खोने के लायक 
नहीं था कुछ भी उसमें 



गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

१ . 
सच् होने लगते हैं ख्वाब

मैं कदम बढाती हूँ 
थोडा सा और आगे चली जाती हूँ 
मैं बाहें पसारती हूँ 
और सब कुछ सिमटता चला आता है करीब 
मैं निगाह उठाती हूँ 
और उडने लगती हूँ 
मैं ख्वाब देखती हूँ 
और सच् होने लगते हैं वे 
  
२. 
रिश्तों के नाम 
ज़रूरी तो नहीं के सब चीजों के नाम हुआ ही करें 
बहुत सारी चीजें बातें बिना नाम के भी होती हैं 
मह्सूसियत की तरह  
जैसे हर सुबह का नहीं होता अलग अलग नाम 
लेकिन हर सुबह होती है अलग हर दूसरी सुबह से 

३. 
यह दुनिया
यह दुनिया जैसी भी बन पाई है 
किसी एक अकेले कारीगर की कारस्तानी से नही बनी है 
हम सभी के पुरखों ने किया है अपनी अपनी तरह से योगदान 

हमारे कंधों पर सदियों का संचित बोझ है 
सदियों का संचित ज्ञान है हमारी झोली मैं 
सदियों के संचित रिश्तों ने गढा है हमे 
अच्छा या कम अच्छा जैसा भी 

यह जिद बेमानी है के रातो रात बदल देंगे हम इसकी शक्लो सूरत 
जितनी भी आजादी और जितने भी बन्धन आए है हमारी झोली में 
सबका है अपना इतिहास

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

ख्वाब सोए हैं जहाँ


थोडा धीरे से आना इस तरफ 
यहाँ मेरे ख्वाब सो रहे हैं 
अभी थपकी देकर सुलाया है उन्हें
कच्ची नींद में न जगाना
बहुत लम्बी यात्रा की थकन है 
सुस्ता लेने दो कुछ देर 
अभी उनके हिस्से 
बाकि हैं बहुत से काम
जब जागेंगे इस बार 
नया करघा बनाना है 
इस बार कुछ नए रंग मंगाने हैं 
कुछ महीन करनी है बुनाई 
थोडा और पारङ्गत होना है उन्हे इस बार 
बुनना है और बहुत से नए ख्वाब