सोमवार, 25 अप्रैल 2011
दो कवितायेँ
रविवार, 20 मार्च 2011
'क्या तुमने चाँद को देखा?'
शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010
उसका जाना
वह एक जंगल में गया
जो बाहर से बीहड़ था
अंदर से बेहद सुकुमार
वहां जगमगाती रोशनियां थीं,
रंग थे, फूलों वाली झाड़ियां थीं,
सम्मोहक तंद्रिल संगीत था
वह गया
कि उतरता चला गया
उसकी स्मृतियों में पीछे छूट चुके हम थे
जिनके बाल बिखरे थे
जिनके पैरों पर धूल जमी थी
जो कई-कई दिनों में नहाते थे
पलट कर उसने देखा नहीं
हम देखते रहे उसका जाना
एक बीहड़ में
खौफनाक जानवरों के बीच
हमें देख हिलाते हाथों की ऊर्जा उसकी नहीं थी।
एक दिन
कपड़े पछीटते-पछीटते एक दिन
मेरे हाथ दूर जा गिरे होंगे
मेरी देह से
चूमते-चूमते छिटक कर
अलग हो गए होंगे
होंठ मेरे चेहरे से
तुम्हारे दांतों बीच दबा स्तन
नहीं कराएगा मेरे ही सीने पर होने का अहसास
वह लड़की जो मुझमें थी
सहम कर दूर खड़ी होगी
तड़प रहा होगा कोई भ्रूण मुझसे हो कर जन्मने को
क्रूर
बेहद क्रूर होगी
मेरे आस-पास की शब्दावली
निश्चेष्ट पड़े होंगे मेरे अहसास
कठिन
उस बेहद कठिन समय में
रचना चाहूंगी जब एक बेहतर कविता
मेरी कलम टूट कर गिर गई होगी
लुढ़क गई होगी मेरी गर्दन एक ओर
तुम अपलक देख रहे होगे
उस दृश्य को।
शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010
रविवार, 27 जून 2010
लौटना था घर
पराजित योद्धा की तरह
लौटना था घर
कोई युद्ध का मैदान नहीं
कोई वांछित सा संघर्ष भी नहीं
ऐसा भी नहीं था कुछ
जिसमें झोंका जा सके
समूची ऊर्जा को
एक घर से दफ्तर के बीच का फासला था
एक फासला था इच्छा से विवशता के बीच
ढेर सारा ट्रैफिक
ढेरों लोगों की बकझक थी
थोड़े से जीवन के बचे रहने की उम्मीद की तरह
रोजाना लौटना था घर
रोजाना के इस लौटने में
रोजाना की पराजय का बोध था।
25 सितम्बर 1998
हवा झुलसा जाती थी
हवा झुलसा जाती थी उसकी इच्छाओं को
बूर ही जाती थी रेत खिलते सपनों को
उसके छोटे-छोटे सुख
दबे थे दूर-दूर तक पसरे धोरों के नीचे
वह लड़की
एक मरुस्थल में जीती थी
तपते रेगिस्तान के बीच
औसत ही मिला था उसे जीवन
पिता की आंखों में खटकने लगी थी उसकी देह
प्रेमी की आंखों में खुभती
पति ने सहलाया बहुत
लगाए थे गोते उसके अंधेरों में
पर
अनछुए ही रहे उसके दुख
भिगोया नहीं किसी बारिश ने
उसे गहरे तक
उसकी नम आंखों के मुंदने पर
भांय-भांय कर उड़ती थी रेत उसके भीतर
वहीं किसी मरीचिका की तरह
डबडबाता दीख पड़ता था
मां का कोमल चेहरा
दुःखों के पहाड़ ढोती मौसी
या हाड़ तोड़ती नानी
विलगा नहीं पाती थी इन चेहरों को वह
हर चेहरे में अपनी ही झलक मिलती उसे
वह भागती चली जाती थी नंगे पांव
जून के निर्जन मरुस्थल में
कहीं कोई कोयल नहीं कूकती
कहीं कोई अमलतास नहीं दीखता था उसकी आंखों को
बस
दूर-दूर तक पसरे धोरे थे
खेजड़ी के रूंख थे
आक थे
और दुःख थे उसके
जिनका भार
बढ़ता ही जाता था
लगातार।
6 जून 1998