सोमवार, 25 अप्रैल 2011

दो कवितायेँ

१.
'देखो वह चला जा रहा है, एक बार भी नहीं देखा मुड़ कर.'
'सुनो यूँ उदास न हो... लाओ मैं तुम्हारा हाथ थाम लेता हूँ कुछ देर.... यहाँ मेरे कंधे पर रख लो अपना सर'
'क्या वह एक बार लौट कर नहीं आ सकता... सिर्फ एक बार बाँहों में लेकर अलविदा कहने के लिए भी नहीं...'
'लौट आयेगा शायद... कोई कैसे जा सकता है तुम्हें ऐसे छोड़ कर... कैसे? वो जा नहीं सकेगा दूर तक.... ओह! काश मैं तुम्हारी कुछ भी मदद कर पाता..'


2.
जब तुम खड़े हो मुंह फेर
मैं भी नहीं पुकारूंगी
पर इन सपनों का क्या करूँ
जहाँ चले आते हो तुम
हर रात
टूट कर करते हो प्यार
क्या ऐसा कोई दरवाज़ा है
जिसे बंद किया जा सके
सपनों पर
ताकि सो सकूं मैं
चैन कि नींद
इन लम्बी अकेली रातों में

रविवार, 20 मार्च 2011

'क्या तुमने चाँद को देखा?'

'क्या तुमने चाँद को देखा?'
'होल्ड करो, मैं बालकोनी में जा कर देखती हूँ.'
'आज उसका रंग तुम्हारी पिंडलियों सा चमक रहा है.'
'काश की हम अपने अपने शहर से झुज्झा डालते और डोर को थाम झूला झूलते और इस तरह कहीं बीच में एक दूसरे को छू जाते. '

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

उसका जाना

वह एक जंगल में गया

जो बाहर से बीहड़ था

अंदर से बेहद सुकुमार

वहां जगमगाती रोशनियां थीं,

रंग थे, फूलों वाली झाड़ियां थीं,

सम्मोहक तंद्रिल संगीत था

वह गया

कि उतरता चला गया

उसकी स्मृतियों में पीछे छूट चुके हम थे

जिनके बाल बिखरे थे

जिनके पैरों पर धूल जमी थी

जो कई-कई दिनों में नहाते थे

पलट कर उसने देखा नहीं

हम देखते रहे उसका जाना

एक बीहड़ में

खौफनाक जानवरों के बीच

हमें देख हिलाते हाथों की ऊर्जा उसकी नहीं थी।

एक दिन

कपड़े पछीटते-पछीटते एक दिन

मेरे हाथ दूर जा गिरे होंगे

मेरी देह से

चूमते-चूमते छिटक कर

अलग हो गए होंगे

होंठ मेरे चेहरे से

तुम्हारे दांतों बीच दबा स्तन

नहीं कराएगा मेरे ही सीने पर होने का अहसास

वह लड़की जो मुझमें थी

सहम कर दूर खड़ी होगी

तड़प रहा होगा कोई भ्रूण मुझसे हो कर जन्मने को

क्रूर

बेहद क्रूर होगी

मेरे आस-पास की शब्दावली

निश्चेष्ट पड़े होंगे मेरे अहसास

कठिन

उस बेहद कठिन समय में

रचना चाहूंगी जब एक बेहतर कविता

मेरी कलम टूट कर गिर गई होगी

लुढ़क गई होगी मेरी गर्दन एक ओर

तुम अपलक देख रहे होगे

उस दृश्य को।

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

उदासी

उदासी ने फिर

बिखेर लिए हैं अपने बाल

अकेलेपन के आगोश में

गिरती चली जा रही हूं

रविवार, 27 जून 2010

लौटना था घर

पराजित योद्धा की तरह

लौटना था घर

कोई युद्ध का मैदान नहीं

कोई वांछित सा संघर्ष भी नहीं

ऐसा भी नहीं था कुछ

जिसमें झोंका जा सके

समूची ऊर्जा को

एक घर से दफ्तर के बीच का फासला था

एक फासला था इच्छा से विवशता के बीच

ढेर सारा ट्रैफिक

ढेरों लोगों की बकझक थी

थोड़े से जीवन के बचे रहने की उम्मीद की तरह

रोजाना लौटना था घर

रोजाना के इस लौटने में

रोजाना की पराजय का बोध था।

25 सितम्बर 1998

हवा झुलसा जाती थी

हवा झुलसा जाती थी उसकी इच्छाओं को

बूर ही जाती थी रेत खिलते सपनों को

उसके छोटे-छोटे सुख

दबे थे दूर-दूर तक पसरे धोरों के नीचे

वह लड़की

एक मरुस्थल में जीती थी

तपते रेगिस्तान के बीच

औसत ही मिला था उसे जीवन

पिता की आंखों में खटकने लगी थी उसकी देह

प्रेमी की आंखों में खुभती

पति ने सहलाया बहुत

लगाए थे गोते उसके अंधेरों में

पर

अनछुए ही रहे उसके दुख

भिगोया नहीं किसी बारिश ने

उसे गहरे तक

उसकी नम आंखों के मुंदने पर

भांय-भांय कर उड़ती थी रेत उसके भीतर

वहीं किसी मरीचिका की तरह

डबडबाता दीख पड़ता था

मां का कोमल चेहरा

दुःखों के पहाड़ ढोती मौसी

या हाड़ तोड़ती नानी

विलगा नहीं पाती थी इन चेहरों को वह

हर चेहरे में अपनी ही झलक मिलती उसे

वह भागती चली जाती थी नंगे पांव

जून के निर्जन मरुस्थल में

कहीं कोई कोयल नहीं कूकती

कहीं कोई अमलतास नहीं दीखता था उसकी आंखों को

बस

दूर-दूर तक पसरे धोरे थे

खेजड़ी के रूंख थे

आक थे

और दुःख थे उसके

जिनका भार

बढ़ता ही जाता था

लगातार।

6 जून 1998