मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

मरुस्थल की बेटी

क्या तुम्हे याद हैं
बीकानेर की काली पीली आन्धियाँ

उजले सुनहले दिन पर
छाने लगती थी पीली गर्द
देखते ही देखते स्याह हो जाता था
आसमान

लोग घबराकर बन्द कर लेते थे
दरवाज़े खिड़कियाँ
भाग भाग कर सम्हालते थे
अहाते मे छूटा सामान

इतनी दौड भाग के बाद भी
कुछ तो छूट ही जाता था जिसे
अन्धड़ के बीत जाने के बाद
अक्सर खोजते रहते थे हम
कई दिनों तक
कई बार इस तरह खोया सामान
मिलता था पडौसी के अहाते मे
कभी सडक के उस पार फँसा मिलता था
किसी झाडी में
और कुछ बहुत प्यारी चीजें
खो जाती थीं
हमेशा के लिए

मुझे उन आन्धियों से डर नहीं लगता था
उन झुल्सा देने वाले दिनों में
आँधी के साथ् आने वाले
हवा के ठंडे झोंके बहुत सुहाते थे
मैं अक्सर चुपके से खुला छोड देती थी
खिड़की के पल्ले को
और उससे मुंह लगा कर बैठी रहती थी आँधी के बीत जाने तक
अक्सर घर के उस हिस्से मे
सबसे मोटी जमी होती थी धूल की परत
मैं बुहारती उसे
अक्सर सहती थी माँ की नाराज़गी
लेकिन मुझे ऐसा ही करना अच्छा लगता था

बीते इन् बरसों में
कितने ही ऐसे झंझावात गुज़रे
मैं बैठी रही इसी तरह
खिड़की के पल्लों को खुला छोड
ठण्डी हवा के मोह मे बंधी

अब जब की बीत गई है आँधी
बुहार रही हूँ घर को
समेट रही हूँ बिखरा सामान
खोज रही हूँ
खो गई कुछ बेहद प्यारी चीजों को
यदी तुम्हे भी मिले कोई मेरा प्यारा सामान
तो बताना ज़रूर

मैं मरुस्थल की बेटी हूँ
मुझे आन्धियों से प्यार है
मै अगली बार भी बैठी रहूँगी इसी तरह
ठण्डी हवा की आस में

4 टिप्‍पणियां:

varsha ने कहा…

मैं मरुस्थल की बेटी हूँ
मुझे आन्धियों से प्यार है
मै अगली बार भी बैठी रहूँगी इसी तरह
ठण्डी हवा की आस में.
vaah!!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अद्भुत तुलना,
झंझावत में छिप जाने की चाह नहीं सींची हमने..

Ashwani ने कहा…

aapne fir se vatan ki yaad dila di :)

Manisha Kaushal ने कहा…

Loved this:)
अब जब की बीत गई है आँधी
बुहार रही हूँ घर को
समेट रही हूँ बिखरा सामान
खोज रही हूँ
खो गई कुछ बेहद प्यारी चीजों को
यदी तुम्हे भी मिले कोई मेरा प्यारा सामान
तो बताना ज़रूर