मेरे घर के सामने था एक मैदान
बारिशों के बाद इसमे उग आती थी
लम्बी लम्बी घास
उन दिनों बच्चों की गेंद
अक्सर गुम हो जाती थी वहां
जब घास कटती
बच्चे तलाश में निकल जाते
अपनी खोई गेंद की
कभी कभार
मैदान के आस-पास निकल आते थे सांप
चूहों के बिलों से आबाद रहता था मैदान
माएं डरती थीं बच्चों को मैदान में भेजने से
लेकिन बच्चे थे की मौका मिलते ही आ जुटते थे यहीं
बच्चों के खेल से आबाद रहता था मैदान
यह जो खड़ी है बहु मंजिला इमारत
जिसके पीछे हमारे घर छुपे
सहमे से खड़े हैं
ठीक यहीं
इसी इमारत के नीचे था
वह मैदान
जो हमारे बच्चों की याद में
अब भी है उतना ही जीवंत
Thursday, December 3, 2009
Tuesday, November 3, 2009
सृष्टि का भार
उसके माथे पर रखा है समूची सृष्टि का भार
कंधों पर उसके धरे हैं पहाड़
पीठ पर उठाये खड़ी है वह
चीड और देवदार
उसकी आंखों से छलकता है
समंदर
उसके हिस्से में टुकड़े-टुकड़े आता है आसमान
पहुंचता नहीं है उस तक बारिश का पानी
बस भीगते रहते हैं पहाड़,
चीड़ और देवदार
वह देखती है बारिश
अपनी सपनीली आंखों से
बढाती है हाथ
और डगमगाने लगता है
सृष्टि का भार
झुकने लगते हैं पहाड़
उसके कदमों को छु कर गुज़रती है नदी
उसके थके पाँव
डूब जाना चाहते हैं
उसके ठंडे मीठे पानी में
बारिश में देर तक भीगना चाहती है वह
कोई आओ
थाम लो कुछ देर सृष्टि
उठा लो कुछ देर पहाड़, चीड़ और देवदार
या भर लो उसे ही अपने भीगे दमन में इस तरह
की वह खड़ी रह सके
थामे हुए अपने माथे पर
अपनी ही रची सृष्टि का भार
कंधों पर उसके धरे हैं पहाड़
पीठ पर उठाये खड़ी है वह
चीड और देवदार
उसकी आंखों से छलकता है
समंदर
उसके हिस्से में टुकड़े-टुकड़े आता है आसमान
पहुंचता नहीं है उस तक बारिश का पानी
बस भीगते रहते हैं पहाड़,
चीड़ और देवदार
वह देखती है बारिश
अपनी सपनीली आंखों से
बढाती है हाथ
और डगमगाने लगता है
सृष्टि का भार
झुकने लगते हैं पहाड़
उसके कदमों को छु कर गुज़रती है नदी
उसके थके पाँव
डूब जाना चाहते हैं
उसके ठंडे मीठे पानी में
बारिश में देर तक भीगना चाहती है वह
कोई आओ
थाम लो कुछ देर सृष्टि
उठा लो कुछ देर पहाड़, चीड़ और देवदार
या भर लो उसे ही अपने भीगे दमन में इस तरह
की वह खड़ी रह सके
थामे हुए अपने माथे पर
अपनी ही रची सृष्टि का भार
बात
बात जब करते हैं हम
मैं कुछ कहती हूँ
तुम कुछ सुनते हो
तुम कुछ कहते हो
मुझे सुने देता है
कुछ और ही
हम हो जाते हैं मौन
तुम कहते हो कुछ
मैं कहती हूँ कुछ
न तुम कुछ सुनते हो
न मैं सुनती हूँ कुछ
यूँ हम करते हैं बात इसके बाद भी
मैं कुछ कहती हूँ
तुम कुछ सुनते हो
तुम कुछ कहते हो
मुझे सुने देता है
कुछ और ही
हम हो जाते हैं मौन
तुम कहते हो कुछ
मैं कहती हूँ कुछ
न तुम कुछ सुनते हो
न मैं सुनती हूँ कुछ
यूँ हम करते हैं बात इसके बाद भी
Monday, November 2, 2009
जुगनू
रात के अंधेरों में
हम जुगनू पकड़ते थे
बंद मुठ्ठी में जुगनू के साथ
हाथ में आ जाता था रात का अँधेरा भी
जुगनू मर्तबान में बंद
लड़ते रहते अंधेरे से
सुबह तक दम तोड़ देते थे
अँधेरा जमा होता गया
कांच की दीवारों पर
हम जुगनू पकड़ते थे
बंद मुठ्ठी में जुगनू के साथ
हाथ में आ जाता था रात का अँधेरा भी
जुगनू मर्तबान में बंद
लड़ते रहते अंधेरे से
सुबह तक दम तोड़ देते थे
अँधेरा जमा होता गया
कांच की दीवारों पर
यहाँ से देखो
यहाँ से देखो
आसमान कितना नीला है
घास कितनी हरी
कितना चटख है फूलों का रंग
कितना साफ़ दिख रहा है
तालाब का पानी
हवा में घुल रही है
कैसी भीनी गंध
नहीं, बंद मत करो
खिरकी के पल्ले
यूँ ही रहने दो उन्हें
आधा खुला
झूलता हवा में
आसमान कितना नीला है
घास कितनी हरी
कितना चटख है फूलों का रंग
कितना साफ़ दिख रहा है
तालाब का पानी
हवा में घुल रही है
कैसी भीनी गंध
नहीं, बंद मत करो
खिरकी के पल्ले
यूँ ही रहने दो उन्हें
आधा खुला
झूलता हवा में
Sunday, August 9, 2009
बदनाम लड़कियां
बदनाम लड़कियां
देर तक रहती हैं
लोगों की याद में
उनसे भी देर तक
याद रहते हैं उनके किस्से
बरसों बाद
बीच बाजार
दिख जाती है जब
अपनी बेटी का हाथ थामे
अतीत से निकल कर चली आती
ऐसी कोई लड़की
उसके आगे-आगे
चले आते हैं याद में
वे ही किस्से
और
ठिठक जाता है एक हाथ
पुरानी दोस्ती की याद में
उसकी ओर बढ़ने से
ठीक पहले
26.6.09
देर तक रहती हैं
लोगों की याद में
उनसे भी देर तक
याद रहते हैं उनके किस्से
बरसों बाद
बीच बाजार
दिख जाती है जब
अपनी बेटी का हाथ थामे
अतीत से निकल कर चली आती
ऐसी कोई लड़की
उसके आगे-आगे
चले आते हैं याद में
वे ही किस्से
और
ठिठक जाता है एक हाथ
पुरानी दोस्ती की याद में
उसकी ओर बढ़ने से
ठीक पहले
26.6.09
Sunday, April 27, 2008
Test Post
नदी - १
बहने को आतुर है
एक नदी
वेगमयी
बाँध के उस ओर
बाँध के द्वार खुलें
तो देखें
नदी का पारावार
बहने को आतुर है
एक नदी
वेगमयी
बाँध के उस ओर
बाँध के द्वार खुलें
तो देखें
नदी का पारावार
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