मंगलवार, 20 मार्च 2018

कवि की मृत्यु पर कोहराम

मृत्यु एक गरिमामय कर्म है 
एक सार्थक जीवन के बाद 
चुचाप उठ कर चल देना 
जिए गए जीवन के प्रति 
गहरी श्रद्धा 
ऐसी मृत्यु 
जिसे आप अपने मौन में 
जज़्ब करते हैं धीरे-धीरे 

मृत्यु कोई हादसा नहीं 
हत्या या असामयिक मृत्यु 
यहाँ मेरा सन्दर्भ नहीं 
एक भरपूर जीवन के बाद 
विदा की घड़ी 
जैसे दूर क्षितिज पर 
ढल रहा हो सूरज 
धीरे-धीरे 
जबकि दीप्त है पृथ्वी 
अब भी उसकी आभा में 

बिना शोर 
बिना कोहराम के 
चला गया एक कवि 
जैसे चले गए उसके पूर्ववर्ती 
जैसे चले जायेंगे अभी और भी कई 
अपने जाने के सही समय पर 

कवि की मृत्यु पर कोहराम 
शोक संदेशों और श्रद्धांजलियों की बाढ़ 
मृत्यु की गरिमा पर चोट सा पड़ता है 
वह जहाँ चला गया है 
वहां नहीं पहुंचेंगे तुम्हारे शोक सन्देश 
उसके पीछे 
इतना शोर मत मचाओ 
वह लिख रहा है 
अपनी अंतिम कविता 
उसके आस पास थोडा धीरे बोलो 
कुछ शोर कम मचाओ 

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

कुछ गलतियाँ भी करो

इधर देखती हूँ कुछ लोग बदलाव की बहुत हड़बडी में हैं. वे यह चाहते हैं कि ब्रा, सेक्स, माहवारी, योनि आदि शब्दों को इतनी बार और इतनी जोर से उच्चारित करें कि लोगों को इनकी आदत हो जाये और फिर वे जैसा चाहें वैसा जीवन जी सकें. यदि यह पुरुष हैं तो उनकी संगिनी या बहन या बेटी अपने मन माफिक जीवन जी सकें. कई बार मुझे इस शोरगुल को सुन ऐसा लगता है जैसे वे इस इंतज़ार में हैं कि पहले दुनिया उनके मन मुताबिक हो जाये फिर वे अपने मन मुताबिक जीना शुरू करें.

तो ऐसे साहिबानों और देवियों से यह कहने का मन है, "भाइयो और बहनो! दुनिया तुम्हारे कहने से नहीं, तुम्हारे बदलने से बदलेगी. जिन महिलाओं को ब्रा पहनने का मन नहीं करता वे न पहनें, यदि सेहत को उसके कोई नुक्सान हैं तो ज़रूर उनकी बात भी करें. लेकिन सोशल मीडिया पर ब्रा विरोधी बहसें चलाते हुए जब आपकी तस्वीरें और आपका पहनावा बाज़ार और समाज के सारे प्रतिमानों को पूरा करता नज़र आता है तो मुझे समझने में कठिनाई होती है कि आखिर यह क्रांति की मशाल आप किन हाथों में देखना चाहती हैं. दुनिया की निगाहों की परवाह करेंगी तो सनद रहे आपने ब्रा पहनी हो या नहीं, यह निगाहें जब चाहें आपकी फिगर नाप लेती हैं. इन निगाहों की निगहबानी कर सको तो करो, वरना उन्हें इतनी तरजीह ही क्यों देती हैं. जब तक आप असहज हैं,  तभी तक वे आपको असहज कर सकती हैं. जो औरतें ब्रा पहनने की नसीहत दें उन्हें कहें कि उन्हें जो पहनना पसंद हो पहनें, आप पर अपनी पसंद न थोपें. क्योंकि आप भी उन्हें नहीं कह रही हैं कि वे कल से ब्रा पहनना बंद कर दें. कोई दोस्त-सहकर्मी हिम्मत नहीं करेगा कि आपसे ब्रा न पहनने के बारे में प्रश्न करे. जो पूछे तो सीधे नाक पर पंच करना और पलट कर पूछना भी मत. भाई, पति, पिता, ससुर से कैसे निपटना है यह तय कर लीजिये. जिस दिन तय कर लेंगी उस दिन न किसी की निगाह खटकेगी, न किसी के सवाल सतायेंगे. आखिर किसी दिन ऐसे ही कुछ औरतें घूंघट हटा कर भी घर से निकली थीं. अपनी सांकलें पहचानिये वे कहाँ लगी हैं, और यह भी कि कौन सी नयी गिरह हमें फिर घेर ले रही है. फिर याद दिला रही हूँ, मैं बहस चलाने के खिलाफ नहीं, लेकिन दुनिया खुद के बदलने से बदलती है.

माहवारी की बात करने वाली वे लड़कियाँ मुझे बहुत प्रिय हैं जिन्होंने माहवारी के बहते खून में दौड़ लगा कर एक स्टेटमेंट दिया. लेकिन किसी को menstruation की स्पेलिंग ठीक से नहीं आती इससे क्या फर्क पड़ता है? हम तो स्कूल के दिनों में टेस्ट मैच कहा करते थे महीने के उन दिनों को, लेकिन उसे लेकर कोई झिझक नहीं थी. मज़े से साइकिल चलाते हुए स्कूल जाते थे, खेलों में भाग लेते और जो मन आता खा लेते थे.  माहवारी, महीना, पीरियड और menstruation यह सब शब्द तो बाद में पता चले. यह भी बहुत बाद में पता चला की लड़कियों को कैसे-कैसे दुर्भाव का सामना करना पड़ता है इस कारण. मंदिर जाने में कभी रूचि थी नहीं इसलिए इस बात से कोई फर्क पड़ा नहीं. वैसे भी ईश्वर कब औरतों के साथ हुआ है, जो उसके दर्शन की खातिर आस-पास के लोगों से दुश्मनी मोल ली जाए. लेकिन आपकी मर्जी है कि आपको पूजा करने में सुकून मिलता है तो साल-महीना-सप्ताह के किसी भी दिन आपको कोई रोक नहीं सकता. बेखटके मंदिर जाइए और अगर और भी ज़ोरदार तरीके से यह सन्देश देना है तो सबको बता कर जाइए. लेकिन उन लोगों का मजाक मत बनाइये जो यह नहीं बता पाते कि माहवारी का खून किस रास्ते निकलता है. उनसे पूछना शरीर से पेशाब किस रास्ते निकालता है, और अगर वे उतना ही असहज न हों तो देखना. और vagina ही नहीं उनके लिए penus शब्द का उच्चारण भी उतना ही दुविधा भरा होगा. शिवलिंग की बात कर लेना दूसरी बात है, औरतों को गाली देना, ट्रेन में टॉयलेट की दीवार पर और फेसबुक पर ट्रोल बन कर कुछ भी लिख देना भी अलग है. वहां उनका चेहरा सामने नहीं होता, कैमरा पर ऐसे लोगों से आँख में आँख डाल माहवारी के बारे में बात करने में हलक तो सूखेगा.

जिन लोगों ने स्कूल में दसवीं से आगे बायोलॉजी नहीं पढी वे नहीं बता पायेंगे कि पेट में जाने के बाद खाना कैसे पचता है और शरीर में रक्त संचरण कैसे होता है इसलिए माहवारी को लेकर लोगों का मज़ाक बनाने से बेहतर है कि इसे लेकर सहज रहिये. दफ्तर में, स्कूल और कॉलेज में मेडिकल किट में सेनिटरी पैड रखे गए हैं या नहीं यह देखिये और अगर नहीं है तो इसकी बेबाक मांग कीजिए. वाशरूम में ढक्कन लगा डस्टबिन नहीं है तो उसकी मांग कीजिये. क्रेम्प होते हैं तो आराम कीजिये, दफ्तर में उसके लिए विशेष अवकाश की मांग कीजिये. सेनिटरी पैड पर GST का विरोध ज़रूर किया जाये, बेहतर और सस्ते उपायों पर भी बात की जाये. लेकिन किसी पैडमैन की पब्लिसिटी के चक्कर में मत आइये. बाज़ार आपकी इसी मासूमियत के दम पर मुनाफा कमाता है. और हाँ! बच्चों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी अकेले स्कूल के सर मत डालिए, घर में अपने बेटे और बेटी दोनों से बात कीजिये. एक-एक बच्चा स्कूल के माहौल को बदलता है, कक्षा के विमर्श को बदलता है. हम जो इन मुद्दों पर बात कर रहे हैं, इस समाज को बदलने में बात करने के साथ-साथ हमारी और भूमिकाएँ क्या हैं? क्या हम वहां अपने हिस्से का काम भी कर रहे हैं.

कितनी महिलाएं अपने अंतर्वस्त्र वाशिंग मशीन में बाकि कपड़ों के साथ नहीं धोतीं. क्यों? अंतरवस्त्रों  को वाशिंग मशीन में सब कपड़ों के साथ धोओ और बेटे को भी कपडे सुखाने में मदद करने दो. वह आपकी कुर्ती सुखा सकता है तो ब्रा और पेंटी भी सुखा सकता है. इस बात को समझो की जिस वक़्त में हम औरतें ब्रा, पेंटी, सेक्स, मेंसट्रूएशन की बात कर रही हैं उस समय में वे देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म, समाज, शिक्षा पर बात कर रहे हैं, नीतियां निर्धारित कर रहे हैं. सतर्क रहो कि कहीं हमें हमारी ही देह की बातों में उलझा कर छोड़ देना उनकी कोई नयी साजिश तो नहीं! बाज़ार और पितृसत्ता दोनों के औज़ार बहुत पैने हैं और हम आज भी उनकी दुनिया में आँखें मलते हुए उठी हैं. वे हमें तरह-तरह से भरमाते रहे हैं, कभी देवी कह कर ऊंचे आसन पर बिठा दिया, कभी स्वयंसिद्धा कह घर और बाहर दोनों का श्रम हमारे कन्धों पर डाल दिया. इसलिए अपनी मर्जी से जीने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद कीजिये, लेकिन निगाह इस बात पर भी रखिये किआखिर कैसी दुनिया चाहती हैं आप जिसमें अपनी मर्जी से जीना चाहती हैं.

और हाँ!  किसी के साथ सेक्स का मन है तो कर लीजिये. आपकी देह पर उसका नाम नहीं छप जाएगा. मन नहीं है तो मत कीजिये. किसी से बात करना, दोस्ती करना, करीब महसूस करना सेक्स के लिए बाध्य नहीं करता. अगर कोई ऐसा समझे तो उसे कहिये कि अपना दिमाग दुरुस्त रखे. दो मनुष्यों के बीच दैहिक निकटता न मुलाकातों की संख्या से तय होती है न परिचय की पुरातनता से. अपनी और अन्य की मनुष्यता से प्यार करो और फिर जो जी चाहे वह करो. किसे साबित करना है की आप सही हैं ? किससे अपने चरित्र का प्रमाण पात्र लेना है? और फिर हमेशा सही ही होना है, ऐसा भी कहाँ ज़रूरी है. कुछ गलतियाँ भी की जाएँ. बस इतना याद रहे कि बदलाव की प्रक्रिया धीमी है. समाज लोगों के बदलने से बदलता है, इसलिए जो बदलाव की बात करता है उसकी यह ज़िम्मेदारी ज्यादा है कि वह खुद से बदलाव को शुरू करे. 

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

कभी कभी मैं अपना लौटना देखती हूँ

पानी से भरी लबालब झील से 
बारिश की सुबह 
जंगल की तरफ खुली खिड़की से 


मैं देखती हूँ अपना लौटना 
दरवाज़े को धडाम से बंद करना 
सांकल चढ़ाना 
और थक कर लुढ़क जाना 
बिस्तर पे 

एक समय के बाद 
आंसू और सिसकियाँ भी 
साथ नहीं देते 
मैं अपने शून्य में लौट आती हूँ 

रविवार, 3 जनवरी 2016

सवेरा होने तक

चाहती तो यह भी हूँ
कि दुनिया में बराबरी हो
न्‍याय हो
कोई भूखा न रहे
सबको मिले अच्‍छी शिक्षा
रोटी पर सबका हक हो
पानी पर सबका हक हो
सबके हिस्‍से में अपनी ज़मीन
सबका अपना आसमान हो

सीमाओं पर कँटीले तार न हों
फुलवारियाँ हों

हम इस तरह जाएँ पाकिस्‍तान
जैसे बच्‍चे जाते हैं नानी घर
या कराँची के सिनेमाघर में
देख कर रात का शो
लौट आएँ हम दिल्‍ली
और चल पड़ें काबुल की ओर
मनाने ईद

जिन सीमाओं पर विवाद हैं
वहाँ बना दिए जाएँ
कामकाजी माँओं के बच्‍चों के लिए
पालनाघर

नदियों पर बाँध न बनाए जाएँ
बसाई जाएँ बस्तियाँ
उन तटों पर
जहाँ बहती हैं नदियाँ

जंगलों में जिएँ जगल के वाशिंदे
वनवासियों की विस्‍थापित बस्तियाँ न बनें शहर
जंगलों को मुनाफे के लिए लूटा न जाए

शिक्षा और विकास जैसे पुराने शब्‍दों की
नई परिभाषाएँ गढ़ी जाएँ

बच्‍चा जो सड़क पर बेच रहा गुब्‍बारा
उसके हाथ में हों तो सही
गुब्‍बारों के गुच्‍छे
लेकिन वह खेल सके उनसे भरपूर
गुब्‍बारा से रंगों से खिले हों उसके सपने

ऐसी अनंत चाहतों की फेहरिश्‍त है मेरे पास
और इन सबके बीच है
एक छोटी सी चाहत
बस इतनी

मेरी आँखों में उगते इन सपनों को
तुन अपनी हथेलियों में चुन लो

और हम साथ चलें सवेरा होने तक के लिए 



('एक और अंतरीप' के अक्टूबर-दिसम्बर,2015 अंक में) 

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

इस तरह चुप हो जाने का वक़्त नहीं है यह

चीख घुट कर रह जाती
डर नहीं  
यह जो बेशर्मी पसरी सब ओर
एक ठंडी जकड़न से भर रही मुझे 

सपनों में गूँज रही
फ़ौजी बूटों की आवाज़ 
आँखें मूँद ज्ञान की भीख मांग रही भीड़ 
हाथ में चाबुक  
हर प्रश्न के जवाब में 
मिलती चाबुक की फटकार 
आप आज़ाद देश के नागरिक हैं 
लेकिन यहाँ 
सिर्फ सहमति का स्वागत है 
इससे अगर शिकायत है 
तो जा सकते हैं पाकिस्तान 
आप 

एक निर्लज्ज मर्द की ठोकर से 
गिरी स्त्री के जख्मो पर 
मरहम लगा रहे बच्चे से 
भयभीत सत्ताधारी 
गूँज रहा सभ्यता का अट्टहास 
चहुँ ओर 

पताका की तरह फहरा रहे मर्द  
स्त्रियों के अंतर्वस्त्रों को 
सिकुड़ता जा रहा ह्रदय उनका 

एक पूरी भीड़ बता रही 
औरतों 
अपने वस्त्र अँधेरे कोनों में सुखाओ 
औरतों 
तुम खुद अंधेरों में चली जाओ 

यह जो फहरा रहे पताका 
यह जो उन्हें अंधेरों में धकिया रहे 
दोनों गरियाते एक दूसरे को 
दोनों मिल कर औरतों को 
पाताल में गिरा आये हैं 

अयोध्या से गोधरा 
मुजफ्फरनगर से दादरी तक 
घूम रहा उनका रथ  
वे कालिबुर्गी की गलियों में घूम रहे 
वे मुंबई में लाठियां भांज रहे 
वे पुणे में तलवार लहरा रहे हैं 
वे दिल्ली में त्रिशूल उठाए घूम रहे
वे कालिख का टोकरा उठाए घूमते 

वे हमारी जुबान पर घात लगाए बैठे हैं 
वे हमारी कोख पर आँख गडाए बैठे हैं 


यह सपना टूटे 
मेरी नींद टूटे 
मैं शापित 
सोने के लिए इन सपनों के बीच 
जबकि वक़्त की पुकार है 
उठाओं मशाल 
सडकों पर उतर आओ 

रविवार, 13 अप्रैल 2014

हत्‍यारे का अट्टहास

कभी आता था दबे पांव
अबकी बार आ रहा है
हम सबके कांधों पर सवार
रानी की नहीं
हत्‍यारे की हम ढोएंगे पालकी अबकी बार
लोकतंत्र के अंतिम क्षण पर हंसेंगे अबकी बार
शाही बैंड बजाएंगे
खुशियों में डूबेंगे उतराएंगे

तानाशाह का फरमान है अबकी बार
'चुनो मुझे'
लोकतंत्र को अभिशाप है अबकी बार
हम चुनेंगे उसे जो विकल्‍प नहीं है अबकी बार

पूछा था गोरख ने
हे भले आदमियो !
कब जागोगे?
कहा था
हे भले आदमियो !
सपने भी सुखी और
आज़ाद होना चाहते हैं ।

नींद हत्‍यारे के सिरहाने नहीं उतरी लेकिन
भले आदमी हैं कि जाने कब से सोए हैं
भले आदमी को पीट रहा है भला आदमी
भला आदमी कह रहा है नो आइडिया सर जी

हवा में गूंज रही इशरत जहां की सिसकियां
पटरियों पर दौड रही हैं जलती हुई रेलें
बंद गली के मुहाने पर खडा है हत्‍यारा
हजारों लाशों के ढेर पर
कर रहा अट्टहास

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

कुछ भी होने और न होने के बीच कहीं


नहीं कहना

अब नहीं कहना
दुख है
जितना कहा
दुख बढता गया

अब नहीं कहना
सुख आओ
जितना पुकारा
सुख दूर होता गया

स्थितप्रज्ञ भी नहीं
कभी दुख का कभी सुख का पलडा
झुकता गया

कुछ भी होने और न होने के बीच कहीं
सुख को पुकारना नहीं
दुख को नकारना नहीं
आंसू जो लुढकना चाहता है
उसे आंख में संजोना भी नहीं
गाल पर ढुलकाना भी नहीं
सुरमा बना लेना भी नहीं
यह जो आंसू मेरे हैं
यह गढते मुझे
और मैं रचती जाती जीवन

जितनी बार पराजय
उतनी बार नया जीवन
मेरे सब दुख
मेरे भीतर सुख की प्यास
बन घुलते जाते



तुम 

एक तुम वह हो
जो तुम हो
बतियाते हो मुझसे
मुझे सुनते हो
जाने क्या सोचते हो
जाने कैसे रहते हो
क्या  चाहते हो
क्यों चाहते हो
चाहते भी हो या नहीं चाहते हो

एक तुम है
जो मुझमें है
शायद तुमसे मिलता सा
शायद न मिलता हो तुमसे इस तरह
मैं अपने भीतर के इस तुम से बतियाती हूं
उसकी आवाजें तुम तक जाती हैं

जब तुम कहते हो 
मैं मुझमें बैठे तुम को सुनती हूं

यह जो तुम बाहर हो
मेरे सामने
यह जो मुझमें है
क्या यह भी बतियाते हैं
दोनों



शब्दार्थ
शब्द
अकेला
निरर्थक
जैसे सांप की
छोडी जा चुकी केंचुल
जब तक
अर्थ की संगति न मिले

अर्थ
कहां ठहरता है
किसी एक शब्द की संगति में
अंटता ही नहीं पूरा
हर शब्द के कई अर्थ

जो कहा गया
जो सुना गया
कहां होता है
दोनों शब्दों का
एक अर्थ

जो कहना हो
उसके लिए सही शब्द
किस कारखाने में
गढे जाते हैं
जो सुनने हों
वे शब्दे मिलते हैं कहां