सोमवार, 25 अप्रैल 2011

दो कवितायेँ

१.
'देखो वह चला जा रहा है, एक बार भी नहीं देखा मुड़ कर.'
'सुनो यूँ उदास न हो... लाओ मैं तुम्हारा हाथ थाम लेता हूँ कुछ देर.... यहाँ मेरे कंधे पर रख लो अपना सर'
'क्या वह एक बार लौट कर नहीं आ सकता... सिर्फ एक बार बाँहों में लेकर अलविदा कहने के लिए भी नहीं...'
'लौट आयेगा शायद... कोई कैसे जा सकता है तुम्हें ऐसे छोड़ कर... कैसे? वो जा नहीं सकेगा दूर तक.... ओह! काश मैं तुम्हारी कुछ भी मदद कर पाता..'


2.
जब तुम खड़े हो मुंह फेर
मैं भी नहीं पुकारूंगी
पर इन सपनों का क्या करूँ
जहाँ चले आते हो तुम
हर रात
टूट कर करते हो प्यार
क्या ऐसा कोई दरवाज़ा है
जिसे बंद किया जा सके
सपनों पर
ताकि सो सकूं मैं
चैन कि नींद
इन लम्बी अकेली रातों में

3 टिप्‍पणियां:

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

अकेली रात और सपना, सिवा खोने के क्या बचता है। मैं तकिए के भीतर सपने को छुपा देता हूं और तुम चादर के भीतर लेकिन सपना है, जिसे निकलना आता है, जिसे छुपाया नहीं जा सकता...आपकी कविता पढ़कर बस यही कह सकता हूं।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्वप्न जो सोने नहीं देते,
यथार्थ में खोने नहीं देते।

Manohar ने कहा…

क्या ऐसा कोई दरवाज़ा है
जिसे बंद किया जा सके
सपनों पर
ताकि सो सकूं मैं
चैन कि नींद
इन लम्बी अकेली रातों में

behad sundar :)