मंगलवार, 3 नवंबर 2009

बात

बात जब करते हैं हम
मैं कुछ कहती हूँ
तुम कुछ सुनते हो

तुम कुछ कहते हो
मुझे सुने देता है
कुछ और ही

हम हो जाते हैं मौन
तुम कहते हो कुछ
मैं कहती हूँ कुछ
न तुम कुछ सुनते हो
न मैं सुनती हूँ कुछ

यूँ हम करते हैं बात इसके बाद भी

5 टिप्‍पणियां:

हरीश करमचंदानी ने कहा…

हाँ ,मौन भी अच्छा माध्यम हैं बात करने का.सुन्दर कविता ,बधाई ..

नव्‍यवेश नवराही ने कहा…

अच्‍छी कविताएं हैं आपकी।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा…

कम शब्दों में बहुत गहन बात कही है आपने.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मौन की अपनी भाषा है । वह कहती नहीं, बहती है । वह ढहती नहीं, सहती है ।

अपूर्व ने कहा…

अद्भुत है..यह शब्दातीत संवाद का भाव जो वार्तालाप की परिधि से मुक्त हो कर चेतना के दूसरे स्तरों पे जाता है..जहाँ शब्द माध्यम नही बहाने होते हैं..बहुरूपिये जैसे..पारंपरिक अर्थों के आवरण से मुक्त..संवाद का यह स्तर ही आदम और इव के बीच का सेतु रहा होगा..जब भाषा की पैदाइश नही हुई थी...पोस्ट याद दिलाती हैं विनोद साहब की दीवार मे खिड़की के जादुई संवादों की..मार्वलस!!