शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

तुम नहीं हो

अच्छा ही है कि तुम नहीं हो 
तुम्हारी याद तुम्हारे होने से कहीं ज्यादा गहरी है 

तुम साथ् होते तो 
चीजें  अच्छी  ही होतीं 
लेकिन 
गर तुम नहीं हो साथ् 
तब भी बेहतर ही होंगी बातें 
कि दोगुनी ताकत 
और कई गुणा हिम्मत, मेहनत 
और प्यार के साथ् 
बनाउंगी मैं उन्हें ऐसा 
कि जान सको तुम 
ठुकराया जिसे तुमने 
खोने के लायक 
नहीं था कुछ भी उसमें 



4 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्मृतियाँ उतनी ही प्रभावी होती हैं..

vandana ने कहा…

कि जान सको तुम
ठुकराया जिसे तुमने
खोने के लायक
नहीं था कुछ भी उसमें

वाह ....यही है आत्मसम्मान

Rakesh ने कहा…

देवयानी ,कविता बहुत ही सरल शब्दों में और सहज प्रस्फुटित हुई है .....न होने के दुःख को रचनात्मक उरझा में बदलती है ,अपने गुणों का परिष्कार कर अस्मिता को नकारने वाले को कभी ...खोने का दुःख होने का अहसास होगा ....वाकई बहुत सुंदर और विशुद्ध प्रेम कविता ...जो प्रेम की शक्ति से उपजी है किसी निराशा से नहीं ...वाह !!!

Parul ने कहा…

Beautiful. Silent. Profound.