मंगलवार, 18 जून 2013

दूर नहीं वह दिन

कितनी तो तरक्‍की कर गया है विज्ञान  
वनस्‍पतियों की होने लगी हैं संकर और उन्‍नत किस्‍में 
फूलों में भर दिए गए हैं मनचाहे रंग 

देह का कोई भी अंग बदला जा सकता है 
मन मुताबिक 
हृदयगुर्दा, आंख या कान 
सभी का संभव है प्रत्‍यारोपण 

मर कर भी न छूटे मोह दुनिया देखने का 
तो छोड़ कर जा सकते हैं 
आप अपनी आंख 
किसी और की निगाह बन कर 
देखा करेंगे इस दुनिया के कारोबार 
बशर्ते बचा हो जीवन के प्रति ऐसा अनुराग 

हांफने लगा न हो हृदय अगर 
जीने में इस जीवन को दुर्निवार 
तो छोड़ जाइए अपना हृदय 
किसी और सीने में 
फिर धड़कने के लिए एक बार
शीरीं-फरहादऔर लैला-मजनूं की तरह 
धड़कता रहेगा यह 
अगर है कोई स्‍वर्ग 
तो वहां से झांक कर देखा करेंगे जिसे आप 

जीते जी दूसरे की देह में 
लगवा सकते हैं आप अपना गुर्दा 
एक से अपना जीवन चलाते हुए 
दूसरे से किसी अन्‍य का जीवन चलता है 
यह सोच थोड़ी और गर्वीली हो सकती है आपकी चाल  

यह तो कुछ नैतिकता के प्रश्‍न 
आने लगे हैं आड़े
वर्ना जितने चाहें उतने अपने प्रतिरूप 
बना सकता है मनुष्‍य 

शायद दूर नहीं व‍ह दिन भी अब 
आपकी खोपड़ी का ढक्‍कन खोल 
बदलवा सकेंगे जब आप 
इसमें उपजते विचार 
राजनीतिकों की बात दीगर हैं 
जिनके खोखल में अवसरानुकूल स्‍वत: 
बदल जाते हैं विचार और प्रतिबद्धताएं 

आप जो स्मृतियों में जीते हैं 
नफा नुकसान की भाषा नहीं समझते हैं 
आपके भी हाथ में होगा तब यह उपाय 
जगह जगह होंगे ऐसे क्लिनिक 
जिनमें जाकर  
बारिश की स्‍मृतियों को बेच सकेंगे औन-पौने दाम 
और बदले में रोप दी जाएंगी सफलता की कामनाएं तमाम  
जिन चेहरों को भुलाना मुश्किल होगा 
सिनेमा की डीवीडी की तरह बदली जा सकेंगी 
उनकी छवियां  
टाम क्रूजजॉनी डेप्‍प और जेनिफर लोपेज 
जिसकी भी चाहेंगे  
उनकी स्‍मृतियों से अंटा होगा आपकी यादों का संसार

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्मृतियाँ फिर भी रह जायेंगी।