शनिवार, 8 जून 2013

सूखे गुलमोहर के तले

चौके पर चढ कर चाय पकाती लडकी ने देखा 
उसकी गुडिया का रिबन चाय की भाप में पिघल रहा है
बरतनों को मांजते हुए देखा उसने 
उसकी किताब में लिखी इबारतें घिसती जा रही हैं 
चौक बुहारते हुए अक्‍सर उसके पांवों में 
चुभ जाया करती हैं सपनों की किरचें 

किरचों के चुभने से बहते लहू पर 
गुडिया का रिबन बांध लेती है वह अक्‍सर 
इबारतों को आंगन पर उकेरती और 
पोंछ देती है खुद ही रोज उन्‍हें 
सपनों को कभी जूडे में लपेटना 
और कभी साडी के पल्‍लू में बांध लेना 
साध लिया है उसने 

साइकिल के पैडल मारते हुए 
रोज नाप लेती है इरादों का कोई एक फासला 
बिस्‍तर लगाते हुए लेती है थाह अक्‍सर 
चादर की लंबाई की 
देखती है अपने पैरों का पसार और 
वह समेट कर रखती जाती है चादर को 

सपनों का राजकुमार नहीं है वह जो 
उसके घर के बाहर साइकिल पर चक्‍कर लगाता है 
उसके स्‍वप्‍न में घर के चारों तरफ दरवाजे हैं 
जिनमें धूप की आवाजाही है 
अमलतास के बिछौने पर गुलमोहर झरते हैं वहां 
जागती है वह जून के निर्जन में 
सूखे गुलमोहर के तले 

6 टिप्‍पणियां:

Kishore Choudhary ने कहा…

बहुत अच्छी कविता।

pravesh soni ने कहा…

उसके स्‍वप्‍न में घर के चारों तरफ दरवाजे हैं जिनमें धूप की आवाजाही है अमलतास के बिछौने पर गुलमोहर झरते हैं वहां जागती है वह जून के निर्जन में सूखे गुलमोहर के तले ....bahut sunder ,hradaysparshi

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही सुन्दर कविता..

Premchand Gandhi ने कहा…

बहुत अच्‍छी कविता है और इसमें देवयानी की काव्‍यसामर्थ्‍य पूरी खूबसूरती से दिखती है। शुभकामनाएं।

vandana gupta ने कहा…

gazab ki soch aur pravah

sushila ने कहा…

"किरचों के चुभने से बहते लहू पर
गुडिया का रिबन बांध लेती है वह अक्‍सर
इबारतों को आंगन पर उकेरती और
पोंछ देती है खुद ही रोज उन्‍हें
सपनों को कभी जूडे में लपेटना
और कभी साडी के पल्‍लू में बांध लेना
साध लिया है उसने"

आपकी संवेदना से पगी अभिव्यक्‍ति दिल को गहरे तक प्रभावित करती है।
बेहतरीन कविता के लिए आपको दिल से बधाई देवयानी !